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Zimedari Ki Shakti

यदि हम सभी अपनी सोचने की दिशा तथा अपनी आदतों में परिवर्तन करें तो हमारी जिंदगी की दशा और दिशा, दोनों में परिवर्तन हो सकता है। किसी ने सच ही कहा है, ‘ईश्वर चुनता है कि हम किन परिस्थितियों से गुजरेंगे, परंतु हम चुनते हैं कि हम इन परिस्थितियों से कैसे गुजरेंगे।’
जिस तरह एक अँधेरे कमरे में अँधेरा भगाने के लिए प्रकाश लाना आवश्यक है, उसी प्रकार जिंदगी से उदासी, दु:ख, जलन, क्रोध, तनाव आदि को दूर करने के लिए हमें अपना मानसिक स्विच ऑन करना होगा, जिससे हम अपनी सोच एवं आदतों में परिवर्तन करके अपने जीवन को सुखमय बना सकें; और हम व हमारा परिवार ईश्वर की बनाई इस खूबसूरत सृष्टि का भरपूर आनंद ले सकें।
अब सवाल यह है कि सोच में परिवर्तन कैसे लाया जाए? उसका एक तरीका, जो समझ में आता है, वह है—अपनी वर्तमान गतिविधियों, आदतों एवं सोच के प्रति जागरूकता पैदा करना; और इसी जागरूकता को पैदा करने की पहल इस पुस्तक में की गई है। इसे पढ़ें और आनंद के साथ वह सब हासिल करें, जो आप करना चाहते हैं।

Zimmedari Responsibility

अगर आपको ज्यादा-से-ज्यादा काम सौंपा जाता है तो यकीन मानिए, आप एक जिम्मेदार व्यक्‍ति हैं, क्योंकि जिम्मेदारी उसी को मिलती है, जो उन्हें निभा सकता है। जिम्मेदारियों को अगर आप बोझ की तरह लेंगे तो ये आपको तोड़कर रख देंगी। इनसे मुँह मोड़ना आपको असफलताओं के गर्त में धकेल देगा।
जिम्मेदारियाँ मनुष्य के जन्म लेते ही उसके साथ जुड़ जाती हैं। परिवार, समाज और देश जिम्मेदारियों के सही निर्वहण से ही चल सकता है। एक की जिम्मेदारी दूसरे की ताकत और सफलता बनती है। दूसरे की जिम्मेदारी तीसरे की सफलता और ताकत बनती है। इस तरह यह श्रंखलाबद्ध ढंग से सफलता की सीढ़ियों का निर्माण करती है, जिन पर चढ़कर व्यक्‍ति, समाज और देश तरक्की करते हैं। अतः एक की जिम्मेदारी दूसरे से जुड़ी है और सबकी अपनी जिम्मेदारी का निर्वहण ही व्यक्‍तिगत और सामूहिक सफलता की गारंटी है।
जिम्मेदार व्यक्‍ति ही महान् बनते हैं और जिम्मेदारियाँ ही व्यक्‍ति को महान् बनाती हैं। आप भी निश्‍च‌ित ही महान् बनना चाहेंगे—प्रस्तुत पुस्तक आपका इसी दिशा में मार्गदर्शन करेगी।

Zindagi

जिस पहली महिला ने मुझे अपनी ओर आकर्षित किया था, वो मेरी माँ ही थी। मैं माँ को कभी खुद से दूर नहीं होने देना चाहता था, इसलिए मैंने चारपाँच साल की उम्र में माँ से कहा था कि मैं तुमसे शादी करना चाहता हूँ। माँ हँस पड़ी थी, कहने लगी कि मैं तुम्हारे लिए परीलोक की राजकुमारी लाऊँगी। मैं कह रहा था कि माँ, तुमसे सुंदर कोई और हो ही नहीं सकती।
मृत्यु से एक रात पहले माँ ने मुझे बताया था कि वो कल चली जाएगी। मैंने माँ से पूछा था, तुम चली जाओगी, फिर मैं अकेला कैसे रहूँगा। माँ ने कहा था, मैं तुम्हारे आसपास रहूँगी। हर पल।
कहते हैं रामकृष्ण परमहंस को पत्नी में माँ दिखने लगी थी। एक औरत में माँ का दिखना ही चेतना का सबसे बड़ा सागर होता है। संसार की हर औरत को इस बात के लिए गौरवान्वित होने का हक है कि वो माँ बन सकती है। उसके पास अपने भीतर से एक मनुष्य को जन्म देने का माद्दा है। उसे बहुधा इस काम के लिए किसी पुरुष की भी दरकार नहीं।
शादी के बाद जो भी मेरी पत्नी से मिला, सबने कहा ये तुम्हारी माँ का पुनर्जन्म है।
विरोधाभासों और कल्पनाओं के अथाह समंदर का नाम जिंदगी है।

Zindagi Ka Bonus

‘जिंदगी का बोनस’ जीवन के कुछ ऐसे अनोखे पलों का दस्तावेज है जो अनायास आपकी झोली में आ गिरते हैं, लेकिन फिर आपकी स्थायी निधि बन जाते हैं। ये पल आपको हँसाते भी हैं, गुदगुदाते भी हैं और वक्त पड़ने पर आपको चिकोटी भी काटते हैं। कभी आँखें नम कर जाते, तो कभी आह्लाद की अनुभूति कराते हैं। ‘कुछ अल्प विराम’ और ‘पलभर की पहचान’ के बाद रम्य रचनाओं की ये तीसरी प्रस्तुति है जो अपनी तरह का एक अनूठा प्रयोग है। जीवन का कौन सा पल कब आपके लिए क्या संदेश लाएगा, कहा नहीं जा सकता। इन पलों को सँजोकर रखना इसलिए जरूरी है। ‘जिंदगी का बोनस’ एक धरोहर बनकर जीवन के आनंद को तो बढ़ाएगा ही, साथ ही मानवीय संबंधों की अमूल्य निधि भी साथ दे जाएगा।

Zindagi Ke 78 Kohinoor

जीवन में होने वाली घटनाएँ हमेशा हमें कुछ-न-कुछ सिखाकर हमारा ज्ञान, अच्छाई और तजुर्बा बढ़ाती हैं। जीवन में कभी-कभी अच्छाई के लिए मनुष्य को कुछ-न-कुछ त्याग करना पड़ता है। जीवन में अच्छाई की यह शिक्षा इनसान को प्रकृति से मिली है। प्रकृति के प्रत्येक कार्य में सदैव भलाई की भावना निहित दिखाई पड़ती है। नदियाँ अपना जल स्वयं न पीकर दूसरों की प्यास बुझाती हैं। वृक्ष अपने फल दूसरों को अर्पित करते हैं। बादल पानी बरसाकर धरती की प्यास बुझाते हैं। सूर्य तथा चंद्र भी अपने प्रकाश को दूसरों में बाँट देते हैं। इसी प्रकार अच्छे इनसान का जीवन भलाई में ही लगा रहता है। जीवन में हर इनसान छोटे-छोटे कार्य करके अनेक प्रकार की अच्छाई संसार में कर सकता है। भूखे को रोटी खिलाकर, अशिक्षितों को शिक्षा देकर, जरूरतमंद को दान देकर, प्यासे को पानी पिलाकर व अबलाओं तथा कमजोरों की रक्षा कर अच्छाई की जा सकती है।
—इसी पुस्तक से
भारत के सांस्कृतिक एवं धार्मिक इतिहास से गहरे लगाव के कारण कोरोना काल में फुर्सत के पलों में तैयार पुस्तक ‘जिंदगी के 78 कोहिनूर’ में घटनाओं और प्राप्त अनुभवों के आधार पर जिंदगी की वास्तविकता को जैसा लेखक ने समझा है, उन्हें दृढ़ संकल्प, साफ नीयत और अटल निष्ठा के साथ स्पष्ट करने का प्रयास किया है।
मेरा यह पहला प्रयास आपके सामने है। यह कैसी बन पड़ी है, इसका निर्णय आपको करना है।

Zindagi Ki Pathshala

चमचमाती इमारतों और अन्य सुविधाओं की बजाय संवेदनशील लोग ही दुनिया को रहने के लिए बेहतर स्थान बनाते हैं।
दृढ संकल्पित व्यक्ति को उसके लक्ष्य तक पहुँचने से कोई नहीं रोक सकता। ऐसे लोगों की ईश्वर भी मदद करता है।
अगली पीढ़ी को समग्र रूप से मजबूत बनाने के लिए स्कूल, माता-पिता और नीति-निर्माताओं को पूरी शिक्षा प्रणाली में शारीरिक शिक्षा को भी शामिल करना होगा। संतुलित विकास से ही हम सक्षम नई पीढ़ी का निर्माण कर सकते हैं।
कोई भी व्यक्ति इनोवेटर बन सकता है, यदि उसकी बुनियाद मजबूत है और आधारभूत चीजों के बारे में उसे पूरी स्पष्टता है।
जिंदगी में लंबी रेस का घोड़ा बनना है
तो पहले कॅरियर बनाइए, पैसा अपने आप
आ जाएगा।
पेड़ तो आपको लगाना ही चाहिए, लेकिन युवा मनों में शिक्षा के बीज भी बोइए; क्योंकि इनसे मिला फल पेड़ों से मिलनेवाले फलों से ज्यादा मीठा होता है।
—इसी संग्रह से
प्रसिद्ध मोटिवेशन गुरु एवं शिक्षक श्री एन. रघुरामन के दीर्घकालीन अनुभव का निचोड़ हैं ये सूत्र, जो ‘जिंदगी की पाठशाला’ में आपको सफल होने और अभीष्ट पाने में मदद करेंगे।

Zindagi Na Milegi Dobara

मानव के रूप में हम न केवल अपनी संतानों की देखभाल करते हैं, बल्कि एक यंत्र ‘बुद्धि’ हमारे अंदर समूचे ग्रह, समूची पारिस्थितिकी, प्रकृति की समूची भेंट की देखभाल करने की शक्ति के रूप में विद्यमान है। और यही यंत्र ‘बुद्धि’ मशीनें बना सकती है, जो किसी को बचा सकती हैं तथा किसी को भी नष्ट कर सकती हैं।
ईश्वर की बनाई कोई अन्य प्रजाति इतनी शक्तिशाली, इतनी दयालु और इतनी चामत्कारिक नहीं है। जीवन निश्चित रूप से एक ही बार मिलता है। और हम में से हर कोई किसी खास उद्देश्य के लिए ईश्वर का दूत बनकर इस पृथ्वी पर आया है। हमारा कार्य उस उद्देश्य का पता लगाना और अपने जीवन को उसकी प्राप्ति में लगाना है।
इस पुस्तक में उन लोगों के बारे में बताया गया है, जो उस उद्देश्य का पता लगा पाए और जीवन को उसी दिशा में मोड़ पाए, जिससे उन्हें ही नहीं बल्कि उनके आसपास के सारे जगत् को प्रसन्नता मिली। अत: जो कुछ करना है, वह इसी जन्म में करना है। जीवन की वास्तविकता और उसके अस्तित्व मात्र का ज्ञान करानेवाली पुस्तक, जो हमें कर्मशील बनाएगी।

Zindagi Unlimited

वह कोई साधारण लड़की नहीं थी, बल्कि बहुत अलग और दिलचस्प लड़की थी। वह आज भी जिंदगी को पूरी तरह से जीने में यकीन करती है और एक भी पल ऐसा नहीं जाने देती, जिसका वह मजा न लेती हो। वह विकलांगता (एस.एम.ए.) से पीडि़त तो थी, लेकिन इसमें वह कुछ नहीं कर सकती थी और सोचने तथा बोलने के अलावा, वह उन बच्चों की तरह थी, जो अपनी सारी जरूरतों के लिए अपनी माताओं पर निर्भर होते हैं। वह भी दूसरों पर निर्भर थी, लेकिन उसने अपनी विकलांगता को अपनी खुशी की राह में कभी आड़े नहीं आने दिया।
उसे खुद नहीं पता था कि खुदा ने आखिरकार उसे बनाने में और उसे सुंदर लड़की के रूप में बड़ा करने में कुछ समय लगाया होगा। उसने कभी अपनी खूबसूरती पर ध्यान नहीं दिया। हालाँकि बाद में, उसे दूसरों से ही यह पता लगा। लोग उसकी तारीफ करते थे और उसे सराहते थे, जिससे उसे यकीन हुआ कि वह सबसे खूबसूरत इनसानों में से एक है। वह एक लाल गुलाब की तरह है, जिसमें खुदा ने सुंदर सुगंध भर दी है।
एक दिव्यांग लड़की की प्रेरणाप्रद कहानी कि कैसे विषम परिस्थितियों में उसने हिम्मत न हारकर, अपनी अद्भुत जिजीविषा के बल पर जिंदगी को मजे से जीया और अपनी शारीरिक अक्षमताओं को बाधा नहीं बनने दिया।

Zindagi Xxl

हमारे देश में दो चीजें बहुत तेजी से बढ़ रही हैं—एक टेक्नोलॉजी का रोग और दूसरा मोटे लोग। पूरी दुनिया में सबसे ज्यादा मोटे लोगों में हम भारतवासी तीसरे नंबर पर आ गए हैं। कहते हैं लगभग 135 करोड़ लोगों में 10 प्रतिशत लोग मोटे हैं, यानी 135 लाख लोग और ये कहानी इन 135 लाख लोगों में से ही एक ‘बकुर नारायण पांडे’ की है।
बकुर बेढोल शरीर और असाधारण रूप का एक ऐसा इनसान है, जिसके शरीर में कैल्शियम, आयरन से ज्यादा आत्मविश्वास की कमी है, वो समाज और संसार के नजरिए से बन चले आदर्शवादी जीवन में कहीं ठीक नहीं बैठ पाता। इन वजहों से बकुर की जिंदगी में हास्य से लेकर गंभीरता तक अनेक परिस्थितियाँ पैदा होती हैं। हर क्षेत्र में असफलताओं के झुंड में घिरे बकुर को, उसका परिवार, मोहल्ला, सब—एक बार सफलता की चौखट तक पहुँचता देखना चाहते हैं, जो बकुर के लिए लगभग असंभव है। कोई इनसान जब सामान्य इनसानों के आदर्शवादी ढाँचे से किसी भी मायने में अलग होता है तो या तो उसका मजाक बनता है या फिर वो इनसान आदर्श बनता है। इसी ऊँच-नीच से भरी बकुर की जिंदगी में पैदा होती अनेक परिस्थितियों की रोमांचक और अत्यंत पठनीय कहानी है ‘जिंदगी XXL’।

Zirahanama

आजादी के मूल्य युद्ध में अंग्रेजों के खिलाफ कुछ लोग गुलामों के नेता थे। उन्होंने शेर की माँद में घुसकर शेर को मारने के गुर सीखे थे। उन्हें विवेकानंद, गांधी, दयानंद सरस्वती, अरविंद, रवींद्रनाथ, तिलक, मौलाना आजाद, भगतसिंह, चंद्रशेखर आजाद, सुभाष बोस, राममनोहर लोहिया, जयप्रकाश, राजेंद्र प्रसाद वगैरह कहा जाता है। इनकी आँखों में उनके लिए आँसू के सपने थे, जिनके घरों के आस-पास मोरियाँ बजबजाती हैं; जिनकी बेटियाँ शोहदों द्वारा देश-विदेश में बेची जाती हैं; जिनकी देह में खून कम और पसीना ज्यादा झरता है; जो किसी सभ्य समाज की बैठक में शरीक होने के लायक नहीं समझे जाते; जो जंगलों में जानवरों की तरह व्यवस्था और विद्रोहियों—दोनों के द्वारा बोटी-बोटी काटे जाते हैं; जिन्हें आजादी ‘स्व-राज’ के अर्थ में मिलनी थी, उनमें ‘स्व’ ही नहीं बचा; जिन्हें विवेकानंद ‘सभ्य अजगर’ कहते थे, वे ही गांधी के अंतिम व्यक्ति को कीड़े-मकोड़े समझकर लील रहे हैं।
—इसी पुस्तक से
समाज की विद्रूपताओं के दंश को अपनी कलम से उकेरनेवाले वरिष्ठ कलमकार कनक तिवारी विगत पचास वर्षों से निरंतर लेखन में रत हैं। समाज, राजनीति, शिक्षा, प्रशासन, सरकार, संस्थान, ऐसा कोई क्षेत्र नहीं, जिस पर इन्होंने झकझोर देनेवाले विचार न व्यक्त किए हों। पाठक के अंतर्मन को स्पर्श करनेवाली पठनीय कृति।